Tuesday, September 2, 2008

सच्ची कहानियों के सच्चे किरदार


अकसर प्यार को निभाने के किस्से कहानियां किताबों में पढ़ते हैं लेकिन जब सच्चा प्यार करने वाले और उसे निभाने वाले सामने हों तो उस पल को जज्ब करना आसान नहीं होता है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। मैं जब पहली बार अमृता प्रीतम जी और इमरोज जी से मिली तो उनका एक दूसरे के लिये प्यार मेरे दिल का छू गया। उनके बारे में बहुत कुछ पढ़ा था, उन कहानियों के किरदार मेरे सामने थे। मैं इस पल को अपने भीतर कहीं छिपा कर रख लेना चाहती थी क्योंकि वहां बस प्यार ही प्यार था। दरसअसल, उन दोनों की आंखों में एक दूसरे लिये जो भाव थे, उसे जानने के लिये उन जैसे का दिल होना जरूरी है। मेरे लिये सब कुछ अजीब लेकिन अर्थपूर्ण था। अमृता के कमरे में एक घड़ी रखी थी, जिस पर कुछ पंक्तियां लिखी थी। समय को रोक कर उस पर नज्म लिखना, कुछ देर बाद मेरी समझ में आ गया। जहां दो प्यार करने वाले रहतेे हैं ,उनके लिये समय भी ठहरा रहता है। घर में सब ओर अमृता और इमरोज दिखायी दे रहे थे। कहीं अमृता की नज्में तो कहीं नज्मों के साथ इमरोज की पेंटिंग। दोस्ती और मोहब्बत की अनोखी दुनियां से मेरा सामना हो रहा था। मैं हर चीज को ध्यान से देख कर यह यकीन करना चाह रही थी कि ये उसी घर की दीवारें हैं जिसके किस्से मैने किताबों पढ़ें है। यह वही घर में जिसमें इसी सदी में प्यार करने वाले दो लोग रहते हैं, अमृता और इमरोज। अमृता जी काफी कमजोर और बीमार दिखायी दे रही थीं। वे लेटी हुई थी, मैंने उन्हें हाथ जोड़ कर अभिवादन किया तो उन्होंने ने भी स्नेह से अभिवादन स्वीकारा। मैंने उनकी कई तस्वीरें किताबों में देखी थी, मन ही मन उन तस्वीरों से उनका चेहरा मिला रही थी लेकिन वे उन तस्वीरों से भी ज्यादा सुंदर लग रही थी, बीमारी की हालत में भी। गोरी रंगत, कोमल भाव लिये चेहरा, एकदम नाजुक सी उंगलियां। सोचने लगी कि इतनी कोमल महिला ने कैसे जमाने को एक तरफ रख कर इतने बड़े बड़े फैसले लिये, न भूलने वाला साहित्य रच दिया। रस्मों रिवाज की चादर को तह कर अपने हिसाब से जिंदगी जी।
मन में धकड़पकड़ मची हुई थी। जो सवाल पूछने के लिये नोटिंग की थी, वह तो मैं बैग से निकाल ही नहीं पा रही थी। एक दूसरे संसार में आ कर मैं अभिभूत थी।
फिर,
उनसे कई मुद्दों पर बातें हुई। वो सब मैं अपनी पिछली पोस्ट पर लिख चुकी हूं।
मेरा मन नहीं भरा था लेकिन अमृता बातचीत से काफी थक चुकी थी। इमरोज बोले, माजां थक गई है, इसे आराम चाहिए। इमरोज अमृता को इसी नाम से बुलाते हैं। नीचे की गैलरी में आ कर फिर इमरोज से भी काफी देर बातें हुई।
वो मुलाकात मेरी जिंदगी में अहम और यादगार पल हैं।
पिछले दिनों दिल्ली आयी तो सोचा इमरोज मिलती चलूं।
मुलाकात से पहले सोचती आ रही थी कि पता नहीं अपनी मोहब्बत के बिना इमरोज कैसे होंगे?
इमरोज से मिल कर नहीं लगा कि वे अमृता के बिना जी रहे हैं, फिर भी पूछ बैठी, कैसे हैं आप , अमृता के बिना, इमरोज बोले, वो गई कहां हैं, वो यहीं है इसी घर में, पिछले पचास साल से यही है मेरे साथ।
मैने पूछा, अमृता जी का जन्म दिन आ रहा है, क्या खास होगा। इमरोज बोले, हमने जन्मदिन को कभी खास तरीके से नहीं मनाया। मांजा को दिखावे से सख्त एतराज रहा है,सो अब दिखावा करने को कोई मतलब नहीं रह जाता।
बोले, अकसर लोग अपनी किताब की प्रस्तावना कराते हैं, किसी खास से लेकिन अमृता को ये भी पसंद नहीं था। जब भी किताब छपती, हम किताब ले आते, रास्ते से फूल खरीदते, किताब को फूल पर रख कर ले आते, यह काम
मेरा ही होता था। मुझे तो ऐसे लगता जैसे अमृता को फूलों पर बिठा कर ला रहा हूं।
इमरोज पेंटिंग करते थे लेकिन फिर नज्म कैसे लिखने लगे, यह अगली बार बतायूंगी
लेकिन एक बात का जिक्र करना चाहूंगी। वहां से लौट कर मैंने अपने दिल्ली आफिस में बात की और बताया कि मैं अमृता जी के जन्म दिन पर कुछ भेज रही हूं।
वह लेख हिंदुस्तान के मयूरपंख पेज पर 31 अगस्त को छपा। मेरे लिये अमृता जी के बारे में लिखना बेहद खास था लेकिन इससे भी खास रहा, इमरोज ने फोन कर बताया ,
´आज किसी ने बताया कि हिंदुस्तान में कुछ छपा है अमृता के बारे में , सो मैने अखबार मंगवाया और पढ़ा। देखा तो आपका लेख था। काफी अच्छा लिखा है आपने।`
मेरे लिये अपनी तारीफ और वह भी इमरोज के मुंह से, बड़ा अनुभव है। यह भी खास रहा कि इस लेख को अहमद फराज के लेख के साथ ही स्थान मिला, फराज साहब का 25 अगस्त को देहांत हुआ हैं। इस बात को इमरोज ने नोटिस लिया और मुझसे शैअर भी किया । अहमद फराज का लेख कवि केदार नाथ जी की ओर से रहा। वैसे अमृता के साथ हर पल कुछ अनोखा ही होता रहा है, जग से अलग थी वे।

20 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छा अनुभव आपने शेयर किया आपने मनविंदर ..शुक्रिया

PREETI BARTHWAL said...

आपने अमृता जी के साथ अपनी मुलाकात की यादें हमारे साथ शेयर की। धन्यवाद

सचिन मिश्रा said...

Bahut accha likha hai.

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

इस रोचक व भावनाप्रधान लेख के लिये आभार ।

ताऊ रामपुरिया said...

अमृता जी और इमरोज जैसी हस्तियों से निजी
मुलाक़ात भी मायने रखती है ! आपने बहुत सुंदर
यादे सेयर की हैं ! आपका धन्यवाद

दीपक तिवारी said...

आपने आपकी यादों को बड़े सुंदर
अल्फाज में लिखा है ! धन्यवाद !

सुशील कुमार छौक्कर said...

कुछ लोगो के सस्मरण भुलाये नही भुलते उन लोगो में से हैं अमृता, इमरोज जी है । आपने अपना अनुभव हमारे से बाँटा अच्छा लगा।

seema gupta said...

Hi, read your article and cant expres my feelings for both of them. It is very interesting to know about Amrita jee.... and also m feeling how lucky you are to have practical experience metting them and having face to face intraction with them..... your words are superb to describe the emotions feelings u felt at there home.... great efforts"

Regards

महामंत्री-तस्लीम said...

"जब सच्चा प्यार करने वाले और उसे निभाने वाले सामने हों तो उस पल को जज्ब करना आसान नहीं होता है।"
सही कहा आपने। आपके ब्लॉग से इमरोज जी के बारे में कई बातें जानने को मिलीं। शुक्रिया।
-जाकिर अली "रजनीश"

parul said...

mam jivan ki itni gharaio mein jakar kaise likhti ho. pyar aur rishto ko nibhana seekhe to koi apse seekhe

parul said...

mam jivan ki itni gharaio mein jakar kaise likhti ho. pyar aur rishto ko nibhana seekhe to koi apse seekhe

parul said...

mam jivan ki itni gharaio mein jakar kaise likhti ho. pyar aur rishto ko nibhana seekhe to koi apse seekhe

रंजन said...

shukriya

विक्रांत बेशर्मा said...

बहुत अच्छी पोस्ट है ...आपने अपने अनुभव को बहुत ही अच्छे ढंग से पेश किया है !!!!!!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

भई वाह इस बेहतरीन पोस्ट के लिये आप साधुवाद की पात्र हैं

Dr. Nazar Mahmood said...

ITS REALLY NICE TO COME ACROSS WITH SUCH EXPERIENCES OF LIFE....... THATS WHY I LIKE TO READ BIOGRAPHIES BECOZ IT GIVES YOU SOMTHING WHICH PROVE TO BE VALUABLE IN UR OWN LIFE.
ITS GOOD, KEEP IT UP MANVIDER.....
HOPE TO SEE MORE FROM UR PEN

parul said...

apse bhut kuch seekhna h. happy techer day

रश्मि प्रभा said...

amrita imroz ke baare me sunna achha laga

मुकुंद said...

मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं- न होतीं अमृता-न होते इमरोज

shama said...

Bohot dertak aapke blogpe padhatee rahee...ab bhee hatneka man nahee ho raha...Amrita Preetam mereebhee sabse pasandeeda hastee hain..."Parchhawayano dhoondanwaleon,
Chhatee wich jaltee aggdaa parchhawa nai hundaa..." Pata nahee maine theekse likha ya nahee, par jabse ye rachana padhee mai unkee qayal ho gayee.
Mujhe aapke blogpe ab harwaqt aana achha lagega!
Mere blogpe jo aapne tippanee dee, uske liye bohot shukrguzaar hun.