Sunday, January 11, 2009

तीन दिन अब सारे मेरे

कई बार तकदीर को आने वाले दिनों का अनुमान हो जाता है लेकिन इसके बारे में और कोई नहीं जान सकता। होनी को पता था कि कविता और पेंटिंग की किसमत तीन दिनों में लिखनी है। बाद में अमृता और इमरोज के जीवन के ये तीन दिन ऐसी महक ले कर आये जिससे उनकी प्यार की बगिया तीन कालों तक महकती रही।

तीन दिनों की भी एक कहानी है जब अमृता और इमरोज साथ साथ नहीं रहते थे।यूंही एक दिन अमृता को इमरोज ने बताया कि उसे एक नौकरी मिल गई है, वह मुंबई जा रहे हैं। अमृता यह जान कर तो खुश हुई कि अपनी खुशी को सबसे पहले इमरोज ने उसी के साथ बांटा है लेकिन यह सोच का उदास हो गई कि इमरोज दूर चले जायेंगे। उस दिन अमृता ने आंखों की नमी को किताब के पीछे छिपा लिया, कहा कुछ नहीं। जाने में तीन दिन थे, अमृता ने इमरोज से कहा, अब ये तीन दिन मेरे हैं, इन्हें मैं अपने हिसाब से खर्च करूंगी।

बहुत बाद में उन तीन दिनों को अमृता की कलम ने कुछ यूं कहा

कलम ने आज गीतों का काफिया तोड़ लिया है

मेरा इश्क यह किस मुकाम पर आ गया है

उठो अपनी गागर से पानी की कटोरी दे दो

मैं राहों के हादसे उस पानी से धो लुंगी

सालों साल गुजर जाने के बाद इमरोज ने उन तीन दिनों को अपनी नज्म में कुछ यूं उतारा।


हम मस्त चल रहे
थे
यह बात तब की है

जब मैं दिल्ली छोड़ कर

दूसरे शहर रवाना हो रहा था
वहां मुझे मेरी मर्जी का काम मिल रहा
था
जाने में अभी तीन दिन बाकी
थे
और तुमने कहा थाये तीन दिन अब सारे मेरे

मौसम पीले फूलों का
था
सड़कें बाग बगीचे पीले फूलों की महक से सराबोर
थे
हमने सारा दिन पीले फूलों के बीच
गुजारा
एक दूजे को चुपचाप देखते हुए

नजरों से एक दूसरे को

कुछ कहते कुछ सुनते हुए

पीले फूल हम पर बरस रहे
कभी हमारे होंठो
पर
कभी हमारे दिलों
पर
कभी हमारी सोचों
पर
वक्त को तो नहीं

लेकिन खामोशी को कहीं यह पता था

कि ये तीन दिन जिंदगी के
के
तीनकाल बन जाएंगे

26 comments:

"अर्श" said...

बहोत ही बेहतरीन नज़्म बहोत खूब.....आपको भी ढेरो बधाई...

अर्श

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर पोस्ट!

Manish Kumar said...

रोचक प्रसंग चुना आपने
हम तक पहुँचाने के लिए आभार

विनय said...

अमृ्ता और इमरोज़ के प्रति आपका लगाव बहुत घनिष्ठ दिखता है


---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

बस इतना की,
मुग्ध हुआ पढता गया और ख़तम होने के बाद भी और पढने की इच्छा बलवती होती चली गयी.
आगंक का इन्तजार और इस बेहतरीन लेखनी के लिए आभार.
रजनीश के झा

सचिन मिश्रा said...

Bahut khub.

नीरज गोस्वामी said...

अब अमृता और इमरोज पर क्या कहूँ?????लाजवाब...अद्भुत...बेमिसाल....
नीरज

विनय said...

आपका सहयोग चाहूँगा कि मेरे नये ब्लाग के बारे में आपके मित्र भी जाने,

ब्लागिंग या अंतरजाल तकनीक से सम्बंधित कोई प्रश्न है अवश्य अवगत करायें
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

प्रदीप मानोरिया said...

यथार्थ सार्थक लाज़बाब इससे अधिक कुछ कहना अशक्य है

बवाल said...

पीले फूल हम पर बरस रहे
कभी हमारे होंठो पर
कभी हमारे दिलों पर
कभी हमारी सोचों पर
कितनी ख़ूबसूरत हैं ये पंक्तियाँ जी, जैसे दिल की आँखें देख रही हों. बहुत ख़ूब !

मोहन वशिष्‍ठ said...

बेहतरीन नज्‍म

वैसे अमृता और इमरोज साहब जी के बारे में आपका ज्ञान अच्‍छा खासा है इसे हमारे बीच प्रेषित करने के लिए आपका बारम्‍बार धन्‍यवाद

Kavi Kulwant said...

very nice.. liked to read you

दिगम्बर नासवा said...

आप जो प्रसंग चुन कर लिखती हैं और जिस तरह से लिखती हैं, उनमे अपने आप अमृता जी की गंध महसूस होती है,
बहुत समय बाद आप की कलम से इतना मोहक प्रसंग निकला बहुत अच्छा लगा

'Yuva' said...

आपकी रचनाधर्मिता का कायल हूँ. कभी हमारे सामूहिक प्रयास 'युवा' को भी देखें और अपनी प्रतिक्रिया देकर हमें प्रोत्साहित करें !!

Dev said...

आपको लोहडी और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ....

Nirmla Kapila said...

is rochak rachnaa ke liye bdhaai

विनय said...

आप भारत का गौरव तिरंगा गणतंत्र दिवस के अवसर पर अपने ब्लॉग पर लगाना अवश्य पसंद करेगे, जाने कैसे?
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

NirjharNeer said...

होनी को पता था कि कविता और पेंटिंग की किसमत तीन दिनों में लिखनी है।..

aapka andaj-e-bayaN khoobsurat hai.
ni:sandeh aap aap ki kalam se avval darje ka sahity srijan hogaa.

aapne meri hoslaafzaaii ki ye meri khushkismatii hai..shukria dil se

vandana said...

dhanyawaad itni khubsoorat nazm padhwane ke liye.
khamosh muhabbat ki khamoshi ko koi khamosh dil hi jan sakta hai.............wah, bahut khoob.

cg4bhadas.com said...

हम आपके आभारी है , और आपके सुझाव , छत्तीसगढ के विकास में सहायक बने इसी आशा के साथ , हमें अपने सुझाव भेजते रहे.
धन्यवाद


cg4bhadas.com
http://www.cg4bhadas.blogspot.com
संपादक

Vijay Kumar Sappatti said...

main kya kahun , nishabd hoon , aur maun mein amrita imroz ke pyar ke ahsas ko ji raha hoon .. aaj hi imroz ji baaten hui... kuch amrita ji ke baaren me kahi gayi ..

in fact main ye kahun to atishyokti nahi gongi ki there are no great lovers than amrita -imroz in modern india.

aap yun hi likhti rahe .. aap ko bahut badhai..

vijay

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

bahut hi acchi gazal likhi hai aapne

योगेन्द्र मौदगिल said...

BEHTAREEN.................bus...s

Harish Joshi said...

तीन दिन जिंदगी के
तीनकाल बन जाएंगे

Very Nice....

vijaymaudgill said...

इश्क़ का सिखर हैं अमृता-इमरोज़ इनकी हर रचना जितनी बार भी पढ़ो नई लगती है।

धन्यवाद रचना पढ़वाने के लिए

Anonymous said...

LEDs, first developed in the early 1960s, produce light by moving electrons through a semiconductor.
Implementation of solar energy has environmental costs that
may hamper its application on large-scale operations to reduce its
impact. These chips directly convert electricity to light
without the use of a filament or glass bulb.

my page: Wandleuchten